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घड़ियों की हड़ताल (Chapter-8)

By KahaniVala

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-( रमेश थानवी ) Ramesh Thanvi

Hindi Sahitya me Khaniyon ka Bada mehhatav hai , hindi kahaniyaan bachhon ke mansik vikas ke liye ek unnat or jacha parkha madhyam hai,Yahan Par hmare dwara देश में प्रौढ़ शिक्षा का अलख जगाने वालों में अग्रणी, साहित्य और दर्शन के अध्येता, एक दौर के प्रतिष्ठित साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ की टीम के सदस्य और राज. प्रौढ़ शिक्षण समिति के अध्यक्ष रहे “श्री रमेश थानवी” ki ek kahani “घड़ियों की हड़ताल (Chapter-8)” prastut ki gayi hai jo prathmik istar ke bachhon ke liye upyukt hai . Yahan par har kahani ka likhit evam maukhik sansakran uplabdh hai , jisse har ek bacchon ko kahani padhne evam samjhne me asani ho or kahani ka anand liya ja sake.

अध्याय 8

राजधानी का बदला हुआ नक्शा राजधानी के आकर्षण की बात बन गई थी। दूसरी ओर स्कूलों का बदला हुआ रूप शिक्षा विभाग के लिए सोच-विचार का विषय बना था। शिक्षा विभाग ने इस नए चमत्कार पर शिक्षाविदों की समिति की राय माँगी थी। राजधानी में सब तरफ से आए घड़ीसाजों की टीम के बयान अभी भी जारी थे। सगतपुर, खैरागढ़ व बजबज के घड़ीसाजों के बाद अब बीकानेर के घड़ीसाज का नंबर था।

बीकानेर से आए घड़ीसाज ने सभी घड़ीसाजों को अपनी ओर आकर्षित किया। उसका रूप-रंग भी निराला था और बातें भी निराली थीं। गोलमटोल कद, मोटा पेट. उस पर लटकता मोटा जनेऊ, गले में रुद्राक्ष की मोटी माला, गंजा सिर, पीछे लटकती गाँव वाली मोटी चोटी, गोल चेहरे पर गोल काँच का चश्मा और मुँह में दबाए पान से उभरा दायाँ गाल सभी को आकृष्ट करने को काफी थे। किसी का ध्यान इस पर न जाए, तो उसके हाथ में लटकती तूंबी पर जरूर जाएगा या फिर उसके कंधे पर लटकते अँगोछे पर जाएगा, जिसमें दोनों सिरों पर दो बड़ी गाँ लगी हैं। बीकानेर के ये बाबा जी चलते हैं, तो इनकी खड़ाऊँ खट-खट करके सभी आकर्षित करती हैं।

घड़ीसाजों की टीम में सभी आँखें बाबा जी को घूरती रहती बाबा जी का वहाँ पालथी मारकर बैठना तथा पान चवाते चवाते रहा के मनकों पर अंगुली चलाना सबको विस्मित कर रहा था। जय विस्मय बढ़ता गया, तो लेह-लद्दाख के घड़ीसाज ने सरकारी अफसर से पूछा कि बाबा जी की तारीफ़ क्या है? लेह लद्दाख के घड़ीसाज के सवाल करने पर सरकारी अफ़सर को याद आया कि सबका परिचय कराना जरूरी था. लेकिन हड़बड़ाहट में वह भूल ही गया था। उसके पास टीम के सभी घड़ीसाजों के जीवन परिचय भी छुपे रखे थे। टीम बनाने से पहले ही सबके परिचय प्राप्त कर लिए गए हैं। सरकारी अफ़सर ने तुरंत वही परिचय लेह-लद्दाख के पड़ीसाज को पकड़ा दिया। परिचय में लिखा था-

“बीकानेर के बाबा रामनाथ जी आ रहे हैं। वे इस जिले के नामी घड़ीसाज हैं। वे गृहस्थ नहीं हैं। पूरे संन्यासी भी नहीं। एक रामद्वारे में इन्होंने पुजारी का काम शुरू किया था। वहीं के बड़े पुजारी से घड़ी ठीक करने का काम भी सीखा था। सवेरे शाम पूजा के अलावा इनके पास दूसरा कोई काम नहीं है। दिनभर बैठे बैठे घड़ियाँ सुधारते हैं। घड़ी सुधारते हुए थक जाएँ तो ताश खेलने लगते हैं। दोनों कामों में बाबा जी पूरे सिद्धहस्त हैं। एक तीसरा काम है- माल मिठाई खाने का। इसमें इनकी बराबरी का दूसरा कोई नहीं पूरी पाँच सेर मिठाई खाते हैं, एक वक्त में शहर में कहीं भी कोई दावत हो तो बाबा जी सदा आमंत्रित है। स्वभाव से प्रेमी हैं। बचपन से ही ज्ञानी ध्यानी हैं। घड़ियों को भी पूरे प्रेम से व ध्यान से ठीक करते हैं। कंधे पर लटकते अंगोछे के एक सिरे पर औजार व आँख पर पहनने का काँच बाँधकर रखते हैं तथा। दूसरे सिरे पर भाँग की गोली साथ बाँधकर चलते हैं। खाने का आयोजन हो, तो पहले भाँग चाहिए और कभी किसी की घड़ी रूठ जाए तो उसकी नब्ज़ देखने का सामान भी साथ जरूरी है।”

बीकानेर के बाबा रामनाथ जी का परिचय पढ़कर सभी घड़ीसाज उनकी बात सुनने को उतावले थे। बाबा जी की बारी आई तो वे पान की पीक सँभालते हुए, नीचे के होंठ को थोड़ा ऊपर उठाकर महात्मा जी की मुद्रा और कथावाचक की आवाज में कहने लगे-

“बेटे! घड़ियों के ठहरने का कारण बड़ा गूढ़ है। इसका अर्थ भी उतना ही गूढ़ है। जरा समझो कि किसी का समय कब ठहरता है ?… जब उसका अंतकाल नजदीक आता है। यह कलयुग के अंतकाल का लक्षण है। कलयुग में आदमी कलों का ही गुलाम हुआ हो ऐसी बात नहीं। वह स्वार्थ में अंधा हो गया है। अपने स्वार्थ में सिकुड़ते लोग हर दूसरे आदमी से कटते जा रहे हैं। सभी को अपनी रोटी सेंकने की चिंता है। दूसरे की रोटी का क्या होगा, इसकी चिंता किसी को नहीं है। पिछले दिनों हर शहर में हड़ताल हुई। आए दिन होती हड़तालों की होड़ ने एक भी माँग ऐसी नहीं रखी, जो जनता-जनार्दन से जुड़ी हो उसके दुख-दर्द से जुड़ी हो। समय तो सबका सरीखा होता है बेटे देश की सारी घड़ियों ने ठहरकर सभी स्वार्थी नेताओं से आम आदमी से जुड़ने का तकाजा किया है। सबके समय को सरीखा समझने का संदेश दिया है।”

सरकारी अफसर ने बीच में पूछा, “आपके शास्त्र तो ऐसा नहीं मानते हैं। वे तो अपने-अपने कर्म को बात करते हैं। फिर सबका समय एक-सा कैसे होगा?”

बाबा रामनाथ जी तमककर बोले, “शास्त्रों वास्त्रों की बात आप छोड़िए। ऐसे सारे शास्त्र कपोलकल्पित हैं। पंडों की करामात हैं। वे सारे शास्त्र फालतू हैं, जो आदमी की पीड़ा से छल करते हो। आदमी की पहली जरूरत रोटी, कपड़ा है, उसके परिवार की सुख-शांति है. उसके बच्चों की मुस्कराहट है। इसके अलावा कोई बात हमारी समझ में नहीं आती। “”

बाबा जी पान की पीक थूकना चाहते थे। उठे, इधर-उधर देखा, कोई जगह नहीं दिखी तो वहीं सरकारी दफ्तर के कोने में पान की पीक थूककर आगे कहने लगे –

“हम तो अकेले जीव हैं, फिर भी पेट हमारा सगा नहीं है। मंदिर में रहें चाहे सड़क पर काम करें, पेट को दो जून की रोटी, जरूर चाहिए। आज समय खराब आ गया है करोड़ों लोग दाने दाने को मोहताज हो गए हैं। बाजार भाव आसमान चढ़ गए हैं, चीजें सारी तहखानों में पहुँच गई हैं, तब भी रेलवाले अपनी बात करते डॉक्टर अपनी बात करते हैं, बाबू लोग अपनी सोचते हैं। वे हड़ताल करते हैं। अपनी तनख्वाह बढ़वाते हैं और चुप हो जाते हैं। हमारी कौन सोचता है। उन करोड़ों मजूरों की कौन सोचता है, जो कहीं नौकरी नहीं करते। उन सबके पेट भी तो रोटी माँगते हैं, लेकिन किसी हड़ताल की माँग उन सबकी जरूरतों से नहीं जुड़ी है। आने आदमी की जरूरतों से नहीं जुड़ी है। अब जब घड़ियाँ रुकी है सभी को पता चला है, समय सबका सरीखा है। अफ़सर भी हैरान हैं और बाबू भी मालिक भी हैरान हैं और नौकर भी ठेकेदार भी परेशान और मजूर भी दुकानदार भी खफ़ा है और खरीददार भी आज घड़ियों ने ठहरकर तकाजा किया है कि सभी एक दूसरे से जुड़ें, सबकी माँगें सबके लिए हों और सबकी यूनियन एक हो । रोटी कपड़े का संकट अगर दूर करना है तो सबको सबसे जुड़ना होगा। संगठन और संघर्ष का दायरा फैलाना होगा। माँगों की सूची में दरिद्रनारायण की मांगों को सबसे ऊपर रखना होगा और उसे हासिल करने के लिए हर तबके के हर आदमी को साथ लेना होगा। मड़ियो का तकाजा, समय का तकाजा है बेटे! तुम भी अपनी सरकार को सावधान कर दो अफसरों और मंत्रियों से कह दो कि आसमान से उतर आएँ, आदमी के साथ जुड़ जाएँ। इसमें अगर देर की तो परिणाम बुरे होंगे।”

बीकानेर के बाबा रामनाथ ने अपनी बात एक तीखी चेतावनी के साथ समाप्त की थी। अपनी बात कहते कहते उनका चेहरा तमतमा गया था। उनकी चेतावनी सभी घड़ीसाजों को सही लगी थी। सभी उनकी बात सुनकर सिर हिला रहे थे, लेकिन सरकारी अफ़सर को उनकी ऐसी चेतावनी व ‘बेटा-बेटा’ कहना अच्छा नहीं लगा था। बाबा जी फक्कड़ थे। उनसे कहा भी क्या जा सकता था। अफसर चुपचाप बाबा जी का बयान सरकारी वही में दर्ज किया। उसमें लिखा गया कि-

‘बीकानेर के बाबा रामनाथ जी, पता नवलनाथ जी का मठ का कहना है कि घड़ियाँ कहती हैं कि रोटी कपड़े का संकट यदि दूर करना है, तो सारी यूनियनों को एक होना होगा, सबको आम आदमी से जुड़ना होगा तथा रोटी कपड़े के संघर्ष में हर तबके के हर आदमी को शरीक करना होगा। बाबा जी ने मंत्रियों और अफसरों को भी चेतावनी दी है कि वे आसमान से उतरें और आदमी से जुड़ें।’ सरकार की वही में बाबा रामनाथ जी के बयान के नीचे यह भी

लिखा था-

‘विशेष

बाबा रामनाथ जी जनसाधारण के हिमायती है। आम आदमी में इनकी आस्था गहरी है। बाबा जी जनांदोलन के भी हिमायती लगते हैं। इन पर नज़र रखना जरूरी है।

-हस्ताक्षर’

 बीकानेर से आए घड़ीसाज बाबा रामनाथ का बयान दर्ज हो चुका है। उनसे मिली सूचना की खबर ने सरकारी जासूसों का काम बढ़ा दिया था। जिस जासूस की ड्यूटी बीकानेर लगी थी, वह खुश हुआ था। उसने सोचा था कि बीकानेर की भुजिया खाने को मिलेगी रसगुल्ले खाने को मिलेंगे, लेकिन जब वह बीकानेर पहुँचकर बाबा नवलनाथ जी के मठ पहुँचा, तो बेचारे सरकारी जासूस की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। बाबा रामनाथ जी अपने जमाने के नामी पहलवान रहे हैं। उनके पास आज भी कई शागिर्द कुश्ती सीखने आते हैं। उनके शागिर्द ही ऐसे सुंड-मुस्टंड और कद्दावर हैं कि सरकारी जासूस जैसे, चार उनकी बगली में छुप जाएँ। फिर भी जासूस महोदय हनुमान जी के दर्शन के बहाने वहाँ पहुँचने लगे। उनको रामनाथ जी के शामिदा से पता चला कि बाबा रामनाथ जी अपनी जवानी में मुगदर घुमाते थे. पाँच-पाँच सौ दंड-बैठक लगाते थे और खड़े खड़े पक्का पाँच सेर घी पी जाते थे। उसने यह भी सुना कि बाबा अब भी अगर किसी को एक धौल लगा दें तो उसे दस दिन होश नहीं आएगा। यह सब सुनकर जासूस महोदय हमेशा डरे रहते थे तथा ऐसे मस्तमौला फक्कड़ पर नज़र रखनी फालतू समझते थे। उन्होंने जो रपट जी थी, उसमें लिख दिया था- ‘कहीं कोई खतरा नहीं है।’ अपनी रपट के साथ ही उन्होंने अपने तबादले की अर्जी भी भेज दी थी। वे अब सिर्फ़ तबादले के ऑर्डर का इंतजार करते थे और हर शाम भुजिया रसगुल्ला खाकर समय काट रहे थे। घर पहुँचने के दिन मिन रहे थे।

घड़ियाँ अब भी बंद थीं। रामनाथ जी बयान दर्ज कराकर दिल्ली से बीकानेर लौट आए थे। कसरत जारी थी। उधर दिल्ली में दूसरे घड़ीसाजों के बयान चल रहे थे। समय ठहरा था। समय भवन मगर चल रहा था। यहाँ बयान भी चल रहे थे और फ़ाइलें भी चल रही थीं। समय मंत्री नए थे। इसलिए वे भी चल रहे थे। वे हर घड़ीसाज के बयान से चौकन्ने हो जाते लगते थे तथा रोज एक वक्तव्य दे देते थे “हम पूरी तरह चौकन्ने हैं, समय को तलाश रहे हैं, जल्दी- खोज लेंगे।”

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