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बगुला और कौवा (HERON AND CROW)

By KahaniVala

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लेखक- गिजूभाई बधेका

Hindi Sahitya me Khaniyon ka Bada mehhatav hai , hindi kahaniyaan bachhon ke mansik vikas ke liye ek unnat or jacha parkha madhyam hai,Yahan Par hmare dwara Gijubhai Badheka ki ek kahani बगुला और कौवा (HERON AND CROW) prastut ki gayi hai jo prathmik istar ke bachhon ke liye upyukt hai . Yahan par har kahani ka likhit evam Maukhik Sansakran uplabdh hai , jisse har ek bacchon ko kahani padhne evam samjhne me asani ho or kahani ka anand liya ja sake.

एक कौआ था। वह रोज नदी किनारे जाता और बगुले को नमस्कार करता। धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती हो गई।

बगुला मछलियां पकड़ने में माहिर था। वह अपने अनोखे ढंग से रोज नई-नई मछलियां पकड़ता और कौए को खिलाता। कौए के तो दिन फिर गए। उसे हर दिन नया भोजन मिलता।

बगुला आकाश में उड़ता, लेकिन निगाह उसकी नीचे रहती। मछली दिखाई देते ही वह फर्राटे से नीचे आता, अपनी लंबी चोंच पानी में डालता और पैर ऊंचे रख झट से मछली पकड़ कर किनारे पर आ जाता। कौआ यह सब देखता । उसका मन होता कि वह भी ऐसे ही मछलियां पकड़े। वह मन-ही-मन सोचा करता, इसमें कौन-सी बड़ी बात है? ऊपर उड़ना, निगाह नीचे की ओर रखना, मछली दिखाई देते ही फौरन नीचे आना, चोंच खोल कर पानी में डालना और औंधा सिर करके पांव ऊपर की तरफ उठाना। मछली चोंच में नहीं आएगी, तो जाएगी कहां?

सब कुछ सोच विचार कर एक दिन कौआ आसमान में उड़ा। बहुत ऊंचा उड़ा। फिर फर्राटे से नीचे आया। पांव ऊंचे रख, चोंच नीची कर फुरती से मछली पर टूटा, लेकिन मछली खिसक गई।

कौए की चोंच काई और बेलों में उलझ गई। पांव ऊंचे रह गए। कौआ छटपटाने लगा। चोंच छुड़ाने की उसने बहुत कोशिश की, पर सिर तो पानी में डूबता चला गया। तभी बगुला वहां आ पहुंचा। उसे दया आ गई। उसने बड़ी मुश्किल से कौए को पानी के बाहर खींचा। फिर कहा :

“करते हो सो कीजिए

नकल न कीजे काग

 चोंच फंसेगी बेल में

पांव बनेंगे काठ “

कौआ समझ गया“नकल बिन अकल… खतराए-जान।

कथा सार

बगुला और कौवा (HERON AND CROW) कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है कि जो व्यक्ति जिस काम को करने का सामर्थय रखता है उसे ही वह कार्य करने देना चाहिए अन्यथा नए व्यक्ति द्वारा खुद की जान-माल को भी खतरे मे डाला जा सकता है ।

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